वैसे शब्द बहुत मिलते है
जीवन में कुछ गढ़ने खातिर
फिर भी अर्थ प्रस्फुटित होते
रहते है अपनी सीमा में
लहरों के झोकों से मन तो
निर्झर सा है साकार प्रिये
बिखरी है चाँद की रात प्रिये
पर कभी नहीं कहना मुझसे
बीती कैसे मधुमास प्रिये |
कुछ अनजानी विस्म्रित्यों का
आभास कभी जब होता है
लगता है आतुरता बहकी
फिर किसी शून्य के कोने से
उठती है ऐसी हुक की
सपने बिखर बिखर रह जाते है
खली गागर बस आश लिए
कपसिलों से घिर जाते है
तब तुम्ही बताओ तारों से
होगा कैसे अभिसार प्रिये |
शुन्य काश के विहग अकेला
बहुत दूर तक उड़ जाता है
किन्तु न मिलती गंध कहीं तब
वापस डैनओ को फैलाये
निराधार से विचलित होकर
आने के कोसिस करता है
बस प्रकश सब धुंधले होते
दिखलाई देने लगते है
कित्नु भ्रमर को कैसे दे दूं
यह नूतन उपहार प्रिये |
जाने कैसी मर्यादा है
जाने कैसे अभिलाषा है
कोई जन सकेगा कैसे
हरपल अनजाना लगता है
जब से मन मंदिर में तुमने
अपनी प्राण प्रतिष्टा कर ली
तबसे सारा देवालय ही
मुझको वीराना लगता है
जग सूना सूना लगता है
वैसे पंथ बहुत मिलते है
किन्तु न विचलित हो मन जिससे
मिला न वह आधार प्रिये |
कभी कभी ऐसा होता है
परिचित पथ से हट जाते है
और अपरिचित पहचाने से
दिखलाई देने लगते है
उमड़ घुमड़ कर बरसाती है
यादो की बूंदे रसवंती
कुहरे मन के छट जाते है
खिलते सुन्दर सपन पसंती
मलयानिल हर्षा जाता है
रक्तिम टेसू के फूलों को
अमराई बौरा जाती है
सुनकर फगुआ की बातो को
यादें धूमिल पद जाती है
दिन व्यतीत होते जाते है
कित्नु कहीं पर हो मन स्थिर
बतलादो वह ठौर प्रिये
क्यों आज नहीं तुम पास प्रिये |
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