Wednesday, November 17, 2010

स्नेह


तुमने इतना स्नेह क्यों किया,शब्द सभी अन्जान हो गये|

मन की अमराई से जब भी
कोयेलिया ने छेड़ी ताने
ऐसी बजी कहीं बासुरियां
अंधेरो पर तैरी मुस्काने
बिखराया क्यों सरगम तुमने, अर्थ सभी गुमनाम हो गये |

वातायन के बंद द्वार से
टकराती रह गई चांदनी
मधुवंती केशर की बुँदे
बरसाती रह गई रागिनी
पलकों के तट से जो उभरे, अश्रु सभी बदनाम हो गये |

मौसम के मरकत पत्रों से
बिछड़ गई है कितनी कलियाँ
एक नहीं तुम मिल पाए प्रिय
बहुत तलाशी हमने गलियाँ
जिन नयनो ने निशा न देखि, स्वप्न सभी शमशान हो गये |

लहरों की भाषा क्या होगी
सागर से क्या नाता होगा
बरखा की लड़ियों से प्यासा
सावन जी बहलाता होगा
जब भी यहाँ छंद है उभरे ,तार तार बेजान हो गये |
तुमने इतना स्नेह क्यों किया,शब्द सभी अन्जान हो गये |

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